आर्यन
उड़ान की पुकार
छोड़ दो…
यह तितली है — खुले आसमान की,
फैलाए पंख जहाँ में,
उड़ना चाहे सौ ब्रह्माण्ड में।
जो निकले तेरे मन से,
दफ़न सृष्टि के कफ़न से,
जो जाए तुझे छूकर,
रास्ता बनाए तेरे तन से।
ना करो खराब इसकी खूबसूरती को,
तुम जानो ना इसकी दूर दृष्टि को,
तुम्हारे हाथों में यह महफ़ूज़ नहीं,
तुम्हारी सोच के पिंजरे से यह कभी खुश नहीं।
अपने आगोश में कब तक दबाओगे,
उसके पंखों के रंग कब तक छिपाओगे?
ज़रा आईना देखो तुम एक बार,
कभी तुमने भी चाहा था मुट्ठी में सारा संसार।
जो यह पर्दा ना करता आँखों को अंधा,
तो तुम भी समझते आसमान के रंगों का धंधा—
उसकी उड़ान, उसकी पहचान,
उसके सपनों का सारा जहान।
जाने दो अब उन हाथों से,
आज़ाद करो उसे खुले मन से,
उसकी मंज़िल तुमसे ऊँची होगी,
तभी उसकी ख़्वाबों की दुनिया सच्ची होगी।
युवा कवि आर्यन
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