Ajay Muskan.
“रथ जहाँ भीतर उतरता है”
आज फिर
नीलाचल ने समय के मस्तक पर
अपनी शाश्वत ध्वजा बाँध दी है;
और जगन्नाथ का रथ
केवल मार्गों पर नहीं,
मनुष्य के भीतर जमे हुए अहंकार पर भी चल पड़ा है।
वह देव नहीं—
चलती हुई करुणा हैं,
जो सिंहासन छोड़कर
जन-जन की धूल को
अपने चरणों का सौभाग्य बना लेते हैं।
रस्सियाँ हाथों में दिखती हैं,
पर खिंचता तो प्रत्येक हृदय है;
जिसे संसार यात्रा समझता है,
वह आत्मा का
अपने ही स्रोत की ओर लौटना है।
जगन्नाथ मुस्कुराते हैं—
मानो कह रहे हों,
“जो मेरे रथ तक आया,
उसे मुझ तक आने की आवश्यकता नहीं;
मैं स्वयं उसके जीवन तक चला आया हूँ।”
यही रथयात्रा का सत्य है—
ईश्वर कभी दूर नहीं रहते,
दूर तो केवल हमारी दृष्टि हो जाती है।
जिस दिन श्रद्धा का द्वार खुलता है,
उसी दिन समस्त सृष्टि
एक ही उद्घोष में बदल जाती है—
“जय जगन्नाथ!”
जहाँ रथ आगे बढ़ता है,
वहीं मनुष्य पहली बार
अपने भीतर के परम पथ का दर्शन कर लेता है।

