Campus Boom.
वीआर मीडिया एंड प्रोडक्शन एवं कैंपस बूम की ओर से आयोजित कैंपस समर इवेंट–2026 के तहत प्राप्त बच्चों की रचनाओं का विशेष प्रकाशन जारी है। इस श्रृंखला का उद्देश्य बच्चों की मौलिक सोच, संवेदनाओं और रचनात्मक अभिव्यक्ति को उसी सहजता के साथ पाठकों तक पहुंचाना है, जैसी भाषा में उन्होंने अपनी भावनाओं को शब्द दिए हैं।
इस विशेष श्रृंखला में प्रस्तुत है मोती लाल नेहरू पब्लिक स्कूल के कक्षा 12वीं की छात्रा अदिती रुस्तगी की कविता। इस कविता के माध्यम से एक पिता अपने बच्चों की खुशियों के लिए अपनी सारी इच्छाओं को किस तरह त्याग देता है. अदिती ने उसे काफी सुंदर ढंग से शब्दों में गढ़ा है.
पिता
माँ की बातें हुईं बहुत,
चलो अब पिता पर आते हैं।
क्या बीतती है उनके दिल पर,
अब वह भी बताते हैं।
छोटे से बहुत प्यार किया,
कि अब लोग भी कहते हैं,
“बेटी को बिगाड़ दिया।”
मैंने ख्वाहिश बताई अपनी,
वह खुद की जरूरतें छोड़ बैठे।
मैंने बोला, “पापा, मुझे यह चाहिए।”
वह होठों से मुस्कुराकर मन में
हिसाब जोड़ बैठे।
अपने आँसू गिराकर हमें हँसाने लगे वो।
अपने ज़माने में खूब ऐश की होगी,
मगर अब खुद कमाने लगे वो।
धीरे-धीरे करके अपना
आशियाना चलाने लगे वो।
लेकर कुछ ज़िम्मेदारियाँ अपने सिर,
फिर एक परिवार बसाने लगे वो।
बेइंतहा मोहब्बत करते हैं,
बस जताते नहीं हैं।
क्या बीतती है उनके दिल में, कभी बताते नहीं हैं।
वो सुन लेंगे ज़माने की हर रोज़,
मगर बेटी को कभी सुनाते नहीं हैं।
वह मोहब्बत करते हैं बेइंतहा,
बस बताते नहीं हैं।
उन्होंने ज़मीन भी खोई अपनी,
फिर बेटी को भी खोया है।
मुस्कुराकर उसकी विदाई पर
वह पूरी रात रोए हैं।
उस दिन के बाद से वह सुकून से कहाँ सोए हैं।
बस एक ज़िद पूरी न होने पर,
बेटा बोल उठा, “आपने किया ही क्या मेरे लिए?”
भाई, एक बार देख इत्मीनान से,
क्या नहीं किया उन्होंने तेरे लिए।
उनसे ज़ुबान लड़ाकर
उन्हें कितना और तोड़ोगे?
अरे! जिन्होंने कमाया हो सिर्फ तेरे लिए,
अब क्या उन्हें कहीं का भी नहीं छोड़ोगे?
रहकर चार दोस्तों में
तू न आवारा बन।
उम्र निकाल दी जिसने तेरे लिए,
उसका बुढ़ापे में सहारा बन।
अदिति रुस्तगी
12 ‘C’
मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल



