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झारखंड में डायन प्रथा जैसी अमानवीय कुप्रथा के खिलाफ दशकों तक संघर्ष करने वाले वरिष्ठ समाजसेवी और जेपी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता प्रेम जी का निधन हो गया। 1980 में फ्री लीगल ऐड कमिटी के गठन में अग्रणी भूमिका के सदस्य रहे। 70 वर्षीय प्रेम जी पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और शहर के टाटा मेन अस्पताल में इलाजरत थे, जहां उन्होंने शुक्रवार (20 फरवरी 2026) को अंतिम सांस ली। उनके निधन से सामाजिक आंदोलनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच शोक की लहर है।
प्रेम जी उन जमीनी कार्यकर्ताओं में शामिल थे जिन्होंने बिना किसी राजनीतिक पद या प्रचार के समाज में गहराई तक काम किया। विशेष रूप से डायन प्रथा के खिलाफ उनकी लंबी लड़ाई ने उन्हें झारखंड ही नहीं, बल्कि देशभर के सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक पहचान दिलाई।
जेपी आंदोलन से शुरू हुआ संघर्ष का सफर
प्रेम जी का सामाजिक जीवन 1970 के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले ऐतिहासिक जेपी आंदोलन से जुड़ने के साथ शुरू हुआ। उस दौर में लोकतांत्रिक अधिकार, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार विरोध के मुद्दों ने युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया, जिनमें प्रेम जी भी शामिल थे।
आंदोलन के अनुभवों ने उनके जीवन की दिशा तय की और उन्होंने सक्रिय राजनीति के बजाय सामाजिक बदलाव का रास्ता चुना। बाद के वर्षों में उन्होंने अपना पूरा समय ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सामाजिक जागरूकता अभियानों को समर्पित कर दिया।
डायन प्रथा के खिलाफ निर्णायक आवाज
झारखंड के कई इलाकों में महिलाओं को अंधविश्वास के नाम पर ‘डायन’ बताकर प्रताड़ित किए जाने की घटनाओं के खिलाफ प्रेम जी ने संगठित अभियान चलाया। उन्होंने: गांव-गांव जाकर जनजागरण अभियान चलाए, पीड़ित महिलाओं को कानूनी सहायता दिलाई, प्रशासन और सरकार के समक्ष मामलों को उठाया, सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर जनसुनवाई आयोजित की।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि डायन प्रताड़ना को अपराध के रूप में स्थापित करने और कानून निर्माण की दिशा में बने जनदबाव में उनके प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
जमीनी कार्यकर्ता की सादगी भरी पहचान
प्रेम जी के बारे में विस्तृत व्यक्तिगत दस्तावेजी जानकारी सार्वजनिक रूप से सीमित रही, लेकिन सामाजिक हलकों में उनकी पहचान एक समर्पित, सादगीपूर्ण और निर्भीक कार्यकर्ता की थी। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन उन परिवारों के साथ बिताया जो अंधविश्वास और सामाजिक हिंसा के शिकार बने। साथियों के अनुसार, वे मानते थे कि “सामाजिक बदलाव कानून से नहीं, जागरूक समाज से आता है,” और इसी विचार के साथ उन्होंने लगातार अभियान चलाए।
समाज के लिए अपूरणीय क्षति
उनके निधन पर विभिन्न सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों और नागरिकों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। लोगों का कहना है कि प्रेम जी ने जिन मुद्दों को उठाया, वे आज भी समाज के सामने चुनौती बने हुए हैं और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।
जैसा गौतम गोप ने बताया
परिवार से अलग रह कर समाज के नाम अपनी जिंदगी कर देने वाले प्रेम जी के अंतिम क्षणों तक सेवा करने वाले गौतम गोप ने बताया कि प्रेमचन्द जी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले के निवासी थे। युवावस्था में जेपी आंदोलन में सक्रिय हुए और आपातकाल में तात्कालिक बिहार के सिंहभूम जिले में आए। समाज के लिए हमेशा तत्पर रहने की प्रवृति के कारण स्वयं सेवी संस्था फ्री लीगल ऐड कमिटी का गठन अपने साथियों के साथ 1980 में किए। संस्था के गठन में जवाहर शर्मा, जीएस जायसवाल, अंजलि बोस और जगन्नाथ गोप के सहभागिता से किए। इस दौरान झारखंड आंदोलन में भी सक्रिय रहे। 1990 से डाइन प्रथा के ख़िलाफ़ मुहिम चलाई। एक दशक के लंबे संघर्ष के बाद 1999 तात्कालिक बिहार राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम बनवाने में अहम भूमिका निभाई। डायन प्रथा को समाप्त करने के अभियान को राजनीतिक – सामाजिक पर पहुचाने के लिए कार्य किए ।ताउम्र सामाजिक कार्य में संलग्न रहे ।

