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भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) जमशेदपुर द्वारा आयोजित कथा गोष्ठी में घाटशिला के चर्चित कहानीकार एवं उपन्यासकार शेखर मल्लिक ने अपनी कहानी ‘सहराव’ का प्रभावशाली पाठ किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में रंगकर्मी, युवा कलाकार तथा साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।
कहानी ‘सहराव’ रंगकर्म की दुनिया और उससे जुड़े कलाकारों के जीवन की जटिलताओं को केंद्र में रखती है। कहानीकार ने सूक्ष्मता के साथ यह दर्शाया कि कला एक सामूहिक प्रक्रिया होने के बावजूद मंच के पीछे काम करने वाले अनेक कलाकारों को अक्सर उचित पहचान नहीं मिल पाती। आदिवासी युवा पात्र कानाई और रूपा के माध्यम से उनकी पीड़ा, अंतर्द्वंद्व और पहचान के संघर्ष को संवेदनशील ढंग से उकेरा गया है।
कहानी में गांव से शहर तक लोक कलाकारों के सफर और उनके अनुभवों को मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार सुदूर अंचलों में अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने वाले आदिवासी समुदायों को शहरी मंचों पर तो स्थान मिलता है, लेकिन उनके योगदान को पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती। कहानी बाज़ारवादी दौर और कला जगत के शक्ति-संरचना (पॉवर स्ट्रक्चर) पर भी सवाल उठाती है।
कहानी के रंग निर्देशक सखीकांत का पात्र इस बात को रेखांकित करता है कि लोक कला का उपयोग मंचीय प्रयोगों के लिए किया जाता है, लेकिन कलाकारों के वास्तविक योगदान का उल्लेख सार्वजनिक रूप से अक्सर अनुपस्थित रहता है। पात्रों के संवाद और संवेदनशील प्रस्तुति ने कहानी को प्रभावी बनाया।
कार्यक्रम की विशेष बात यह रही कि कई युवा एवं बाल रंगकर्मियों ने पहली बार कहानी-पाठ का अनुभव किया, जिसे उन्होंने प्रेरणादायक बताया।
कथा गोष्ठी में गोमहेड से रामचंद्र मार्डी, उर्मिला हांसदा, जलेस से शैलेन्द्र अस्थाना, बरुण प्रभात, पथ से मो. निज़ाम, छवि, खुर्शीद, सत्यम, नेहा, विकास, रूपेश, आशीष, सुमन, पूजा, अमितेश, प्रलेस से कृपाशंकर, विनय कुमार, नियाज़ अख़्तर, अहमद बद्र, शशि कुमार, इप्टा घाटशिला से ज्योति एवं स्नेहज सहित इप्टा जमशेदपुर के दिव्या, वर्षा, सुजल, नम्रता, सुरभि, ध्रुव, गुंजन, अभिषेक, अंजना, श्वेता, प्रशांत, अर्पिता तथा युवा साथी रमन और संजय सोलोमन समेत अनेक रंगकर्मी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन कला और समाज के संबंधों पर सार्थक संवाद के साथ हुआ।

