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जनवादी लेखक संघ, सिंहभूम इकाई के तत्वावधान में प्रयाग कक्ष, तुलसी भवन, बिष्टुपुर में युवा साहित्यकार वरुण प्रभात के कविता संकलन “अंतहीन रास्ते” पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ युवा हस्ताक्षर अजय महताब के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों का अभिनंदन करते हुए संकलन को समकालीन साहित्य में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप बताया।
युवा कवि निशांत सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह संकलन “गागर में सागर” की कहावत को चरितार्थ करता है। इसकी कविताएँ आरंभ से अंत तक पाठक को बांधे रखती हैं और उसे गहन चिंतन के लिए प्रेरित करती हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार शैलेन्द्र अस्थाना ने कहा कि संकलन में युवा मन की बेचैनी, पीड़ा, आक्रोश और संवेदनाओं का प्रभावी चित्रण है। उन्होंने “अंतहीन रास्ते”, “बाबूजी” और “फैसला” जैसी कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें संघर्ष और पीड़ा तो है, लेकिन कहीं भी विलाप नहीं है।
सुधीर सुमन ने संकलन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हुए कहा कि इसमें युद्ध की विभीषिका के साथ-साथ आम आदमी के रोज़गार और जीवन संघर्ष की झलक मिलती है। डॉ. सुभाष चंद्र गुप्त ने पाठकों से इन कविताओं को समझने और आत्मसात करने का आग्रह किया।
जयनंदन ने वरुण प्रभात के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी कविताएँ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं और उनमें स्पष्ट वैचारिकता एवं जीवन संघर्ष की छाप दिखाई देती है।
वरिष्ठ कवयित्री ज्योत्सना अस्थाना ने अपने समीक्षीय वक्तव्य में कहा कि कविता मनुष्य को मनुष्य बनाने की एक सुंदर साधना है। वहीं वीणा पाण्डेय भारती ने कहा कि यह संकलन केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गंभीर विचार के लिए भी प्रेरित करता है और निर्भीकता से सत्ता से सवाल करता है।
अध्यक्षीय संबोधन में अशोक शुभदर्शी ने कहा कि यह संकलन हिंदी कविता की मौलिक संवेदनाओं का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें दमित वर्ग के सवालों और अधिकारों को प्रभावशाली स्वर मिला है।
कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ कवि राजदेव सिन्हा ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सुजय भट्टाचार्य ने दिया। कार्यक्रम की सफलता में कई साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों की सक्रिय भागीदारी रही।

