रेणु कुमारी, जमशेदपुर।
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की यह चौपाई अक्सर विवादों में रहती है, क्योंकि आज के समय में ‘ताड़न’ शब्द का अर्थ ‘पीटना’ या ‘हिंसा’ मान लिया गया है. वहीं आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टि व आधुनिक संतों ने इसका अर्थ अत्यंत गहरा और अनुशासनात्मक बताया है. यहां ‘ताड़न’ का वास्तविक अर्थ है – गहराई से देखना, परखना, सही प्रबंधन करना या मर्यादा में रखना. समुद्र स्वयं को ‘जड़’ मानते हुए भगवान राम से कहता है कि जिस प्रकार कुछ वस्तुओं या पात्रों को विशेष ध्यान और अनुशासन की आवश्यकता होती है, वैसे ही उसे भी सही मार्ग दिखाने के लिए प्रभु के अनुशासन की आवश्यकता है.
इसे साधारण शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है कि जिस प्रकार ढोल को मधुर संगीत उत्पन्न करने के लिए सही ताल और कसावट की आवश्यकता होती है, वैसे ही पशु को भटकने से बचाने के लिए निरंतर निगरानी चाहिए. समाज के अल्पज्ञानी या उद्दंड व्यक्ति को भी उचित शिक्षा और मार्गदर्शन (ताड़न) की जरूरत होती है, ताकि वे पथभ्रष्ट न हों. इसी प्रकार, नारी के संदर्भ में ‘ताड़न’ का अर्थ उसे प्रताड़ित करना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षा, सम्मान और विशेष संरक्षण देना है. यह पूरी चौपाई दमन की नहीं, बल्कि ‘संतुलन’ और ‘मर्यादा’ की शिक्षा देती है. भगवान राम का संपूर्ण चरित्र ही शबरी और निषादराज जैसे पात्रों के प्रति प्रेम पर आधारित है, जो यह सिद्ध करता है कि तुलसीदास जी का संदेश केवल अनुशासन और कल्याणकारी प्रबंधन का था, न कि किसी के अपमान का.
नोट: यह लेख लेखिका के निजी विचार और अध्ययन पर आधारित है।


