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जमशेदपुर: बिष्टुपुर स्थित कैफे रीगल में रविवार को झारखंड की पारंपरिक सोहराई लोक कला पर एक दिवसीय व्यावहारिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। ‘द हाइप एंटरटेनमेंट’ (टीएचई), विजुअल आर्टिस्ट अर्नब कुमार कोले और इंजीनियर अमरनाथ योगी की पहल पर आयोजित कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों से आए 21 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
सुबह 11 बजे से दोपहर 2 बजे तक चले तीन घंटे के सत्र का उद्देश्य नई पीढ़ी को सोहराई कला की ऐतिहासिकता, सांस्कृतिक महत्व, पारंपरिक प्रतीकों और प्राकृतिक रंगों से परिचित कराना तथा इसके संरक्षण के प्रति जागरूक करना था।
कार्यशाला की शुरुआत परिचयात्मक सत्र से हुई, जिसमें प्रतिभागियों को सोहराई कला के इतिहास और सांस्कृतिक संदर्भों की जानकारी दी गई। इसके बाद मुख्य मार्गदर्शक अर्नब कुमार कोले ने सोहराई की पारंपरिक शैलियों, रंग संयोजन और विभिन्न प्रतीकों के अर्थ को लाइव डेमो के माध्यम से समझाया। फाइन आर्ट्स के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक अनुभव रखने वाले अर्नब हाल ही में राष्ट्रीय स्तर के ‘वन स्टेट वन आर्टिस्ट’ लोक कला सम्मेलन में झारखंड की सोहराई कला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
इसके बाद प्रतिभागियों ने उनके मार्गदर्शन में स्वयं कैनवास पर सोहराई चित्रकारी की। डॉक्टर, विद्यार्थी, कलाकार, नौकरीपेशा लोगों और जनजातीय समुदाय के प्रतिभागियों ने एक साथ कला का अभ्यास किया, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माहौल बना।
सोहराई झारखंड की फसल कटाई से जुड़ी पारंपरिक लोक कला है, जिसमें पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, प्रकृति और जनजीवन से जुड़े प्रतीकों को प्राकृतिक रंगों के माध्यम से चित्रित किया जाता है। कार्यशाला में प्रतिभागियों को इस कला के सांस्कृतिक महत्व से भी अवगत कराया गया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता अन्नी अमृता तथा सामाजिक कार्यकर्ता तरुण कुमार भी उपस्थित रहे। समापन पर सभी 21 प्रतिभागियों की कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया और उन्हें सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
आयोजक अमरनाथ योगी ने कहा कि उद्देश्य केवल सोहराई का इतिहास बताना नहीं, बल्कि लोगों को स्वयं इस कला को अनुभव करने और कैनवास पर उतारने का अवसर देना था। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और युवाओं को इससे जोड़ने के लिए भविष्य में भी ऐसे आयोजन किए जाएंगे।
प्रतिभागियों ने कार्यशाला को अनुभवात्मक और सुकून देने वाला बताते हुए कहा कि तीन घंटे कब बीत गए, इसका पता ही नहीं चला। उनके अनुसार बिना किसी प्रतियोगिता के सीखने और कला का आनंद लेने का अनुभव बेहद खास रहा।


